बाहर की दुनिया रंगीन,
उसने देखी है बहुत,
इस कमरे को खुद की आँखों से
वो दुनिया के,
कुछ रंग दिखाता है।
घुप्प अँधेरे में भी,
उसका चेहरा जगमगाता है,
वो, कमरे के अंदर के अँधेरे से लड़ता,
उसे मिटाता है।
थोड़ा जिद्दी है वो,
यहाँ अँधेरा देखता है यदि
जबरन, उजियारा ले आता है!
तन्हा काली रातों में भी -
जब रौशनी के हर कतरे से नफरत करता है इस कमरे का हर क़तरा -
तब भी!
हाँ, तब भी।
फिर खुद ही खुद में मुस्कुराता है - फ़िज़ूल ही,
उसे देख, मजबूरी में,
ये कमरा मुस्कुराता है,
पलट कर फिर मुस्कुराता है वो चेहरा,
अबकी बार,
शायद अपनी जीत पर।
वो चेहरा -
मेरी दीवार में रहने वाली खिड़की का है,
इस कमरे की रोशिनी-वाहक,
और उस दीवार की जीवन-संगिनी का चेहरा -
वो चेहरा -
जो जिन्दा है इस दीवार की अंतिम सांस तक,
या इस कमरे के अँधेरे के ख़त्म हो जाने तक।
चेहरा -
मेरी दीवार में रहने वाली खिड़की का।