खिड़की दरवाजों से झांकती इन यादों का क्या कीजिये,
छेड़ दीजिये थोड़ा, या यूँ ही छोड़ दीजिये ?
लड़ती-झगड़ती, मनुहार-दुलार करती इन यादों का क्या कीजिये,
चपत धीरे से लगा दीजिये, या लाड़ थोड़ा और दिखा लीजिये ?
आँखों से झरती, होंठो से खिरती इन यादों का क्या कीजिये,
रोक लीजिये, या बहने दीजिये ?
कुछ तितलियों सी रंगीन हैं मेरी यादें, कुछ पानी सी बेरंग भी, क्या कीजिये,
किताबो में छुपा लीजिये या हवाओं मे उड़ा इन्हे दीजिये !!!